महाविद्यालय, बिल्हा में “भारतीय भाषा परिवार” पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आगाज़

शासकीय अग्रसेन महाविद्यालय, बिल्हा (जिला-बिलासपुर) में भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार (नई दिल्ली) के सौजन्य से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन “भारतीय भाषा परिवार” का शुभारंभ बुधवार को गरिमामय एवं बौद्धिक वातावरण में हुआ। सम्मेलन के प्रथम दिवस देश-प्रदेश से आए प्रख्यात शिक्षाविदों, भाषा-विशेषज्ञों, साहित्यकारों एवं शोधार्थियों की उपस्थिति में भारतीय भाषाओं की वैचारिक परंपरा, सांस्कृतिक एकता तथा समकालीन प्रासंगिकता पर गहन विमर्श किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती एवं महाराजा अग्रसेन जी की पूजा, दीप प्रज्ज्वलन, सरस्वती वंदना तथा छत्तीसगढ़ राज्य गीत के साथ हुआ। सम्मेलन के मुख्य अतिथि आचार्य ए.डी.एन. वाजपेयी, कुलपति, अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय, बिलासपुर रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. आई.डी. तिवारी (सेवानिवृत्त), खैरागढ़ विश्वविद्यालय ने की।
महाविद्यालय की प्राचार्य एवं सम्मेलन की स्थानीय समन्वयक डॉ. (श्रीमती) सावित्री त्रिपाठी ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि भारतीय भाषाएँ केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक चेतना की आधारशिला हैं। सम्मेलन की विषयवस्तु का परिचय डॉ. अतुल कुमार गिरि, सहायक प्राध्यापक (अंग्रेज़ी) ने प्रस्तुत किया।

देश-प्रदेश के विद्वानों की सहभागिता

सम्मेलन में रामजस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से डॉ. उमाशंकर पाण्डेय, प्रो. वराप्रसाद कोल्ला, डायरेक्टर, एमिटी इंस्टिट्यूट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी रायपुर, कोलकाता से आए प्रो. नीलाद्रि शेखर दास, प्रो. अमर सिंह (प्राचार्य, शासकीय महाविद्यालय, चांद, छिंदवाड़ा), प्रो. स्वाति चंदोरकर (प्रोफेसर, शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, नरसिंहपुर), डॉ. संजय अनंत (साहित्यकार), श्री ए. के. शर्मा (साहित्यकार) , प्रोफेसर एन.डी.आर. चंद्रा ( पूर्व कुलपति बस्तर विश्वद्यालय), डॉ. गुलशन दास मैडम, प्रोफेसर सुधीर शर्मा, बिलासपुर से प्रो. रामास्वामी सुब्रामोनी, प्रो. जी.ए. घनश्याम , डॉ. अनुराग चौहान, डॉ. पी. के. पाण्डेय, डॉ. के. के. भंडारी, डॉ. यू. के. श्रीवास्तव, प्रो. के. अहमद सहित छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश एवं अन्य राज्यों के अनेक वरिष्ठ शिक्षाविद एवं साहित्यकार, प्राध्यापक, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में छात्र छात्राए शामिल हुए। उनकी सहभागिता ने सम्मेलन को एक सशक्त राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।
भाषा विवाद का विषय नहीं, भाषा संवाद का विषय है।

मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. चित्तरंजन कर, सेवानिवृत्त प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष, अंग्रेज़ी विभाग, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर ने “भारतीय भाषा परिवार” विषय पर अत्यंत विचारोत्तेजक व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि आज समस्या विचारों की नहीं, बल्कि दृष्टि की है। शब्द तो बहुत हैं, किंतु उनके भीतर निहित अर्थ और संवेदना को समझने की क्षमता लगातार कमजोर होती जा रही है।
प्रो. कर ने स्पष्ट किया कि भाषा केवल संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि समाज की संवाद-शक्ति है। भाषा के माध्यम से ही समाज अपनी स्मृति, संस्कृति और चेतना को आगे बढ़ाता है। जब भाषा कमजोर होती है, तब समाज की वैचारिक शक्ति भी क्षीण हो जाती है।
उन्होंने भारतीय भाषाओं की बहुलता में निहित एकता को रेखांकित करते हुए कहा कि किसी भी राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना उसकी भाषाओं में निहित होती है। सभी भाषाएँ समान महत्त्व की अधिकारी हैं और उनका संरक्षण एवं संवर्धन सामूहिक उत्तरदायित्व है।
पुस्तक एवं स्मारिका का विमोचन
इस अवसर पर “भारतीय भाषा परिवार” विषयक पुस्तक तथा राष्ट्रीय सम्मेलन की स्मारिका (Souvenir) का विमोचन किया गया, जो सम्मेलन में प्रस्तुत शोध-विचारों एवं अकादमिक विमर्श का प्रतिनिधित्व करती है।

सांस्कृतिक संध्या में “कैकई” नाटक का सशक्त मंचन

सम्मेलन के प्रथम दिवस सायंकालीन सत्र में आयोजित सांस्कृतिक संध्या ने कार्यक्रम को विशेष ऊँचाई प्रदान की। इस अवसर पर “कैकई” नाटक का प्रभावशाली मंचन किया गया, जिसका निर्देशन प्रो. स्वाति चंदोरकर, प्रोफेसर, शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) द्वारा किया गया।
नाटक में कलाकारों द्वारा प्रस्तुत जीवंत, भावप्रवण एवं प्रभावशाली अभिनय ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया। नाटक के माध्यम से भारतीय मिथकीय परंपरा, नारी-चेतना एवं मानवीय द्वंद्व को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया।
सांस्कृतिक कार्यक्रम का समग्र आयोजन श्रीमती करुणा गायकवाड़ के निर्देशन में किया गया, जिसमें महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता निभाई।
कार्यक्रम का कुशल संचालन, सम्मेलन के समन्वयक डॉ. अतुल कुमार गिरि एवं डॉ. रघुनंदन प्रसाद शर्मा द्वारा किया गया। सत्र का समापन आयोजन सचिव डॉ. संजय भजनकर द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
सम्मेलन का प्रथम दिवस बौद्धिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय चेतना के स्तर पर अत्यंत प्रेरणादायक एवं स्मरणीय रहा।

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